राज्यसभा सांसद कर्तिकेय शर्मा ने आज उच्च सदन में वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने के अवसर पर विस्तृत वक्तव्य दिया। उन्होंने इसे भारत की राष्ट्रीय चेतना और सभ्यता की उस धारा का प्रतीक बताया जिसने देश को राष्ट्रीयता की पहली और सबसे सशक्त भाषा दी। शर्मा ने कहा कि यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक और राजनीतिक धरोहर है जिसे वर्षों तक उपेक्षित रखा गया।
वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व
सांसद कर्तिकेय शर्मा ने गीत की उत्पत्ति 1875 में नैहाटी–उत्तर बड़सत में बताई। उस समय भारत में न संसद थी, न संविधान, न राष्ट्रीय ध्वज। फिर भी एक ऐसा गीत लिखा गया जिसने भारत को भू-भाग नहीं बल्कि माता के रूप में संबोधित किया और राष्ट्रीयता की परिभाषा बदल दी। उन्होंने सदन को याद दिलाया कि ब्रिटिश शासन इस गीत से डरता था क्योंकि यह राजनीतिक चेतना को बढ़ाता था और देश भर में कक्षाओं से जेलों तक, बंगाल से पूरे भारत तक फैल गया।
वर्तमान और ऐतिहासिक संदर्भ
सांसद ने 1905 के स्वदेशी आंदोलन में गीत के नैतिक प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि 1937 में राजनीतिक दबाव के कारण इसे केवल दो अंतरों तक सीमित कर दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने 1925 और 1975 के बीच इस गीत के नैतिक विरोधाभास और आधुनिक बंगाली साहित्य के जनक बंकिम चंद्र चटर्जी की अकादमिक उपेक्षा की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि जो सभ्यता अपने निर्माताओं को भूल जाती है, वह स्वयं को भूल जाती है।
राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भरता का संदेश
कर्तिकेय शर्मा ने वंदे मातरम् को आत्मनिर्भरता, नैतिक साहस, ज्ञान और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का सक्रिय दर्शन बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए आत्मनिर्भर भारत के आह्वान को भी वंदे मातरम् के संदेश से जोड़कर बताया। अपने भाषण के अंत में उन्होंने कहा, “माँ भारती के सामने हम सब एक हैं। पार्टी बाद में है, राष्ट्र पहले है। राजनीति बाद में है, राष्ट्र पहले है। धर्म और मज़हब बाद में हैं, राष्ट्र पहले है।”
मीडिया से बातचीत में सांसद का संदेश
संसद के बाहर मीडिया से बात करते हुए शर्मा ने कहा कि सरकार ने सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने सिनेमा घरों में राष्ट्रीय गान और वंदे मातरम् के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इससे हर नागरिक को यह स्मरण होता है कि वह किसी भी जाति, दल या विचारधारा से पहले भारतवासी है।
उन्होंने संसद में प्रतिदिन कार्यवाही शुरू होने से पहले सभी सांसदों से एक स्वर में वंदे मातरम् गाने का आग्रह किया, ताकि यह केवल औपचारिकता न रहकर राष्ट्र के सर्वोपरि होने का दैनिक स्मरण बन सके।