लंबे समय तक जिन देशों की अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका पर निर्भर रहीं, वे अब नई रणनीति बनाने में जुटे हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति और टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के फैसलों ने कई मित्र देशों को भी असहज कर दिया है। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर साफ दिख रहा है। ऐसे माहौल में यूरोप और कनाडा ने अब अमेरिका पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, और इस पूरी रणनीति के केंद्र में भारत उभरकर सामने आया है।
यूरोपीय संघ (EU) और भारत के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। इसे “मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील” कहा जा रहा है। भारत और EU मिलकर दुनिया की करीब 25 प्रतिशत GDP और लगभग एक-तिहाई वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका की सख्त टैरिफ नीति से कई देश परेशान हैं।
इस समझौते से भारत को खास फायदा होगा। कपड़ा, जूते, रत्न और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान उत्पादों के निर्यात में भारत को बड़ी राहत मिलेगी, जो अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हो रहे थे। वहीं, यूरोपीय संघ को भारत के 27 सदस्य देशों से आने वाले अधिकतर उत्पादों पर कम या शून्य टैरिफ का लाभ मिलेगा। खास बात यह है कि भारत ने अपने डेयरी और कृषि क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखकर अपने संवेदनशील हितों की रक्षा भी की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप फैक्टर ने भारत-EU समझौते को अंतिम रूप देने में अहम भूमिका निभाई। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदारी का संकेत है, जिसमें भरोसा और स्थिरता सबसे बड़ी ताकत है।
इसी तरह, कनाडा भी अब भारत के करीब आता दिख रहा है। अमेरिका के साथ तनाव के बीच कनाडा ने भारत के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। अब कनाडा भारत को कच्चा तेल और गैस भेजेगा, जबकि भारत कनाडा को रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद देगा। आने वाले समय में यूरेनियम, परमाणु ऊर्जा और अहम खनिजों पर भी समझौते हो सकते हैं।
ब्रिटेन और ब्राजील जैसे देश भी भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। कुल मिलाकर, अमेरिका की अनिश्चित नीतियों के बीच भारत ने खुद को एक स्थिर, भरोसेमंद और मजबूत वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित किया है। यही वजह है कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है।